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सिंगरौली के भू-अर्जन में भ्रष्टाचार का जंगलराज! 80 हज़ार हेक्टेयर वनभूमि कागजों से बेदखल

अफसरों और माफियाओं की मिलीभगत से हुआ करोड़ों का खेल

Singrauli News: सिंगरौली के भू-अर्जन में भ्रष्टाचार का जंगलराज! 80 हज़ार हेक्टेयर वनभूमि कागजों से बेदखल

अफसरों और माफियाओं की मिलीभगत से हुआ करोड़ों का खेल

विशेष संवाददाता सिंगरौली

Singrauli News: सिंगरौली। कोयले और ऊर्जा की राजधानी कहलाने वाला सिंगरौली अब भ्रष्टाचार के जंगलराज की मिसाल बनता जा रहा है। जिले के जंगलों में वह दीमक लग चुकी है, जो हरियाली नहीं बल्कि लूट बो रही है। हैरत की बात यह है कि करीब 80 हज़ार हेक्टेयर वन भूमि का रिकॉर्ड ही रहस्यमय ढंग से गायब है। न नक्शा, न खसरा, न खाता, न खतौनी — और इसी ग़ायबगीरी के खेल में अफसरों और भू-माफियाओं के गठजोड़ ने सरकारी खज़ाने को करोड़ों का चूना लगा दिया है।

 

गायब रिकॉर्ड का इतिहास

1988 में जब सिंगरौली (तब सीधी जिले का हिस्सा) के 77 गांवों की करीब 92 हज़ार हेक्टेयर भूमि वन विभाग को सौंपी गई थी, तब सोचा भी नहीं गया होगा कि कभी खुद विभाग के पास अपनी ज़मीन का रिकॉर्ड नहीं रहेगा। आज स्थिति यह है कि वन विभाग के पास सिर्फ 16 गांवों का ही दस्तावेज़ मौजूद है — बाकी 61 गांवों की 80 हज़ार हेक्टेयर भूमि बिना नक्शे और बिना खसरे के “अदृश्य” हो चुकी है।

मुआवज़े के नाम पर खेल

इस फर्जीवाड़े की गहराई का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिलायंस कंपनी के पूर्व अधिकारी के.के. त्रिपाठी ने जुलाई 2024 में मुख्य सचिव को शिकायत भेजी थी।उनका आरोप — राजस्व अफसरों ने अपने रिश्तेदारों और प्रभावशाली लोगों के नाम पर सरकारी जमीन दर्ज कराई, और फिर अधिग्रहण दिखाकर करोड़ों का मुआवज़ा ले लिया गया। दस्तावेज़ों के साथ दोबारा शिकायत भेजी गई, मगर फाइल आज भी “सिस्टम” के किसी कोने में दबी पड़ी है।

बंधा कोल ब्लॉक में मुआवज़े का नया अध्याय

बंधा कोल ब्लॉक के लिए चार गांवों की लगभग 800 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण के दायरे में है। लेकिन जांच में पाया गया कि इनमें से 500 हेक्टेयर भूमि पर कोई वन व्यवस्थापन हुआ ही नहीं, जबकि बाकी ज़मीन 1958–85 के रिकॉर्ड में सरकारी दर्ज थी। अब प्रश्न यह है कि सरकारी भूमि बाद के रिकॉर्ड में “निजी” कैसे बन गई? क्या यह केवल लापरवाही थी या योजनाबद्ध साजिश?

डीएफओ का स्वीकारोक्ति पत्र

डीएफओ सिंगरौली अखिल बंसल ने स्वयं कलेक्टर को पत्र लिखकर स्वीकार किया है कि विभाग के पास 61 गांवों की सीमा स्पष्ट नहीं है और वन व्यवस्थापन 1988 के बाद से नहीं हुआ। यानी विभाग खुद मान रहा है कि उसकी ही ज़मीन “कागज़ों से बेदखल” हो चुकी है।

डिजिटल इंडिया में गुम 80 हज़ार हेक्टेयर

जब केंद्र और राज्य सरकार “डिजिटल इंडिया” के नाम पर भूमि अभिलेखों को ऑनलाइन करने की बात कर रहे हैं, तब सिंगरौली की यह तस्वीर व्यवस्था के खोखलेपन की सबसे काली परत उघाड़ती है।अगर रिकॉर्ड गायब हैं — तो कौन ज़िम्मेदार है?किसके कार्यकाल में यह सरकारी संपत्ति निजी में बदली?और करोड़ों के मुआवज़े का असली हकदार कौन — जनता या माफिया?

नए कलेक्टर के लिए पहली अग्निपरीक्षा

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नवागत कलेक्टर गौरव बैनल इस महाघोटाले की तह तक पहुंच पाते हैं या नहीं। यह मामला न केवल उनकी प्रशासनिक सूझबूझ की परीक्षा है बल्कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ पहला बड़ा परीक्षण भी। क्या वे उन “नाती-पोतों, रिश्तेदारों और सिस्टम के अंदरूनी लाभार्थियों” के नाम उजागर कर पाएंगे जिन्होंने मुआवज़े के नाम पर सरकारी जमीन को अपनी बपौती बना लिया?

सिंगरौली का सवाल – कब रुकेगी यह दीमक?

डीएमएफ (District Mineral Fund) की बंदरबांट का मामला अभी बाकी है — यानी जंगल से शुरू हुई यह लूट अब खदानों तक फैली है। सवाल यही है कि क्या सिंगरौली के जंगलों में लगा यह “सिस्टम का दीमक” कभी रुकेगा? या फिर हर हरियाली, हर दस्तावेज़ और हर जनहित इसी तरह कागज़ों में ही दफन रह जाएगा? जब जंगल ही फाइलों में बदल जाएं, और फाइलें अफसरों की अलमारियों में गुम हो जाएं तब समझ लीजिए, व्यवस्था सिर्फ़ लकड़ी नहीं, ईमान भी काट चुकी है।

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  • 'देश दस्तक समाचार' एक भरोसेमंद चैनल है जो जनता की आवाज़ को बुलंद करता है। यह चैनल निष्पक्ष, ताज़ा और ज़मीनी हकीकत से जुड़ी खबरें दिखाने के लिए समर्पित है। देश के हर कोने से विश्वसनीय और सच्ची रिपोर्टिंग इसकी पहचान होगी।

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